Saturday, 19 August 2023

राखी तिहार (छप्पय छंद)

पबरित मया तिहार, माह सावन मे आथे।
घर-घर सबे दुवार, बिकट सुग्घर मन भाथे।
बच्छर दिन बड़ भाग, मोर घर बहिनी भूरी।
बचपन सुरता आय, खान जब होरा झूरी।
मुचमुच हाँसत गोठ कर, भई मन ल बइठाय हे।
दीया थारी बार धर, बंदन कलश सजाय हे।

आरती बने उतार, पियर चाऊर ल साने।
मुड़ माथ फूल ढ़ार, तिलक म चाऊर दाने।
रक्छा संगे लाज, भई बहिनी के आँखी।
बहिनी के हे ताग, हाथ मा बाँधय राखी।
ये बंधना बलखरहा, जिन्गी भर के संग दे।
बहिनी तोरे सबे दुख, अंतस ले तँय रंग दे।

आशीष दे हजार, जियत रहव मोर भाई।
भाई दे उपहार, करय अल्करह बधाई।
अंतस कुंवर पान, तोर गुरतुर हे बानी।
जाबे छुटही जान, चुही आँखी ल पानी।
लउहा आबे फेर तँय, डाहर जोहत थाड़ हँव।
सुध लमाये गुनत मँय, घुना खावत काड़ हँव।


तेरस कैवर्त्य "आँसू"
सोनाडुला (बिलाईगढ़) 
जिला-सारंगढ़-बिलाईगढ़ (छ.ग.)
मोबाइल-9399169503