Monday, 31 July 2017

** प्रकृति दशा **

Created by :- Teras Kaiwartya (Aansu)
Date :- 03/01/2016
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    मानव स्वयं विनाश को तुले हैं।
    जानकर भी अनजान बन भूले हैं।

    वनों का हो रहा है दोहन ,
    जीवों का हो रहा है पतन ।
    हरियाली सिमटने लगी है ,
    पर्यावरण बिगड़ने लगा है ।
    ध्यान करो ये जीवन का झूले है।

    पर्वत नदी झील बदल रही है ,
    शनै: शनै: भूमि निगल रही है ।
    अत्यंत प्रदूषण अब जकड़ रहा है ,
    आलम है विष चहुं पनप रहा है ।
    संवारे वादी को फिर क्यूं सुले है ।

    प्रसाधन की अब अंबार लगी है ,
    कचरो की देखो बाढ़ लगी है ।
    प्रतिपल संकट बना हुआ है ,
    जल का स्तर में कमी हुई है ।
    समाधान के बजाय रंग मे घुले है।

    निरंतर रही खिलवाड़ प्रकृति की ,
    कांप रही भू रुदन क्षितिज भी ।
    संतुलन बिगड़ विकराल हो जाती ,
    धन-जन का जो विनाश कर जाती ।
    विपदा से जीवन फिर क्यूं रुले है ।

    स्वार्थी मनमाने नशा पान करे ,
    स्वयं को भव से राम नाम करे ।
    अचरज देख मुख फफक पड़े है ,
    "आँसू " की बूंदें जब टपक पड़े है ।

    मानव स्वयं विनाश को तुले है ,
    जानकर भी अनजान बन भूले है ।
    निर्मल हो भू-अंबर , वृक्षारोपण लगायें ,
    क्षति मुक्त हो जग , सभी प्राणी बचायें।

    रचनाकार :- तेरस कैवर्त्य (आँसू )
         सोनाडुला, (बिलाईगढ़)
    जिला - बलौदाबाजार (छ.ग.)
    मोबा.- 9165720460, 7770989795

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