बहिनी दीदी जात हे, अपन मयके दुवार।।
हे महतारी कमरछठ, बेटा बरे उपास।
घर-घर रहे बहूरिया, बने सिखाये सास।।
बेटा जुग-जुग जीय तँय, माँगय माँ बरदान।
मोरे सिधवा दुलरवा, मोर करेजा जान।।
तीजा रहे उपास सब, नारी मन के जात।
उमर पति के बढ़ाय बर, करू भात सब खात।।
आवव संगी साज बो, बइला ला धो मांज।
पटका पोरा सांझ के, पूजा कर मन भांज।।
मुरली मोहन झूलना, आये जनम तिहार।
माखन हाड़ी फोड़ना, भाये शुभ बुधवार।।
सावन भादो होत हे, परब रंग बरसात।
बासी नारी खात हे, घरो-घर में समात।।
सिरजनकार:-
तेरस कैवर्त्य 'आँसू"
सोनाडुला (बिलाईगढ़)
जिला-सारंगढ-बिलाईगढ़ (छ.ग.)
मोबाइल - 9165720460
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