Thursday, 17 September 2020

तेरस के रस

 अमृत ध्वनि छंद (किसान) छत्तीसगढ़ी


नर - नारी के जात जी , नींदें कोंड़े खार।

भूख घाम सह सह गये , बहरा बामी नार।।

बहरा बामी , नार धान बड़ , सुग्घर हावे।

राख जतन बर , खेत जाय ला , अंतस भावे।।

हमर पुतर ला , पढ़ातेन सुन , मोरे कारी।

कमा धमा के , फसल उगाबो , हम नर - नारी।।


सिरजन :- तेरस कैवर्त्य "आँसू"

सोनाडुला (बिलाईगढ़)

जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)

तेरस के रस

                             दोहा छंद (बेटी)


सुता तरू की नव कली , करे वरण छठ साँच।

विविध कष्ट में बल लगा , तनिक रोष नहिं आँच।।१।।


दूज वरण बेटा वधू , भोज भरण ससुराल।

वंश दीप की पग बढ़ा , जन्म दिये लघु लाल।।२।।


तीन वरण में राधिका , केशव रतन सुहाग।

चित में रनते देवता , झूमें जीवन बाग।।३।।


चौथ वरण कर तारिणी , ममता आँचल छाँय।

लोरी गाती लाल को , लेके गोद सुलाय।।४।।


पाँच वरण में सासु माँ , सुझ - बुझ के परिवार।

पोता - पोती मन लगा , घर - घर की संसार।।५।।


छठ में राखी बाँधती , बहना मेरा हाथ।

मातु पिता घर छुट गयी , चले पिया के साथ।।६।।



रचना :- तेरस कैवर्त्य "आँसू"

सोनाडुला (बिलाईगढ़)

जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)



दोहा छंद (हिन्दी भाषा)

 सरल सुगम का राग है , हिन्दी भाषा सार।

अलंकार रस छंद में , मन से खोल विचार।।


अधर कंठ का ताज है , मधुर वचन तुम बोल।

हिन्द बसे हर साँस में , सब से है अनमोल।।


हिन्दी मेरी जान है , देश धरा की आन।

एक बने की डोर है , मधुरस की है खान।।


हिन्दी माला मे रचे , हर स्वर की पहचान।

सुबह शाम हर रात को , गाते हिन्दी गान।।


राज - राज में देश के , आती भाषा काम।

बोलो हिन्दी नमन है , रोशन होगा नाम।।



रचना :- तेरस कैवर्त्य "आँसू"

सोनाडुला (बिलाईगढ़)

जिला - बलौदाबाजार .(छ ग.)

दोहा छंद (देह)

 मनुज देह का क्या पता , कब चल यम के धाम।

नीत जगत में नाम हो , करो ध्यान शुभ काम ।।


प्रेम राग के जाल में , बँधे हुए नर - नार।

योग रखो तुम आपसी , जीवन सच्चा सार।।


भाई - भाई सुन सखा , मैं पंछी आजाद।

त्याग करूँ जब देह को , कर लेना बस याद।।


समय चक्र का साथ ही , वंश एक तो खोय।

बाँस खाट में सो गये , फूट - फूट घर रोय।।


तेरस आँसू कह गये , भव सागर से पार।

दया भाव मन में रखो , विनती करे हजार।।




रचना :- तेरस कैवर्त्य "आँसू"

सोनाडुला (बिलाईगढ़)

जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)