ढ़ाल बन लडे़ सीमा में , शत्रु से लोहा लेना है।
प्रहरी बैर की नींद उड़ाते, जो मेरे वीर सेना है।
घूस जाओ उनके जमी , चीर उनके सीने को।
राख करो ऐसे मुल्क को , निडर सीख जीने को।
रहम नहीं करना भारत , कटोरे वाले उस पाक को।
तिरंगा लहरा उनके वादी , नाज करो हिन्दुस्तान को।
सबक सीखा कर अभिनंदन , आतंकी पनाह देते है।
सदा झूठ छल कर कायर , सदियों से गुनाह करते है।
ऐसे जुल्म सितम हिंसक को , जड़ धड़ से पतन करो।
सारे जहां से अच्छा भारत , देश वीरता को नमन करो।
रचनाकार - तेरस कैवर्त्य (ऑसू)
शिक्षक, सोनाडुला (बिलाईगढ़)
जिला - बलौदाबाजार (छ.ग.)
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