Saturday, 30 July 2016

** याद करना मुझे **

Created by - Teras Kaiwarta (Aansu)
Date - 16/10/2004
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जब चले जायेंगे , याद करना मुझे।
रहो हंसते सदा , रो -रोकर ना रुठे।

     अब तक तुम बीच हमसे शरारत हुई ,
     बिगड़े शिकवे गिला या करामत हुई ।
     जो हुआ सो मैं उनका गुनहगार हूँ ,
     सजा पाने को मैं तो भी  तैयार हूँ ।
भूल जाना मुझे , नाज करना मुझे।
जब चले जायेंगे , याद करना मुझे।

     नाम लेने से मेरा , गला भर आयेंगे ,
     सपने में आँख से ,आँसू बह जायेंगे।
     संग छोड़ गयी , तुने इस साथी का ,
     साथ ना रहे कोई , अब मुसाफिर का।
करुं विनय तुझे , दाग करना मुझे।
जब चले जायेंगे , याद करना मुझे।

     हर महीने मे तेरह , तेरस आते रहेंगे ,
     राग मेरे ऐ काश , गुनगुनाते रहेंगे।
     उम्र ढल ही गयी , ये साँस संसार से ,
     फासला हो चली ,अब घर परिवार से।
बीते कल चार पल , हाथ करना मुझे ।
चीता की शैय्या में , आग करना मुझे ।

जब चले जायेंगे , याद करना मुझे।
हों तो अंंतर्मन  मे , राज करना मुझे ।

         तेरस कैवर्त्य (आँसू )
        सोनाडुला,(बिलाईगढ़ )
          मो.- 9165720460

Friday, 29 July 2016

* कल्पत आँसू *

Created by -Teras Kaiwartya (Aansu)
Date -13/10/2014
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गुइया बछरे -बछर ल, जीये हन साथ म।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

दुनिया के रीत हावय , आना अऊ जाना ओ।
मया पिरीत जतन के , जिनगी बिताना ओ।
आँसू झिन बोहाबे रे संगी ,अपन आँखी म।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

सुरता के डोरी बँधा के , गुनत झिन रइबे ओ।
मने मन मा मोला झूला के , मया मोर भुलइबे ओ।
पथरा बनाले रे संगी , तय अपन छाती ल।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

किरिया खाये रहे जोही , संगे जीबो मरबो ओ।
आनी -बानी सपना दिखा , कहे नइ बिछरबो ओ।
मुरछ देबे का रे संगी , मँय लगाहूं फाँसी ल।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

आँसू -आँसू तय मोर आँसू , मय तोर आँसू ओ।
जियत भर लुकाय लेबे , करेजा के पाछू ओ।
दीया तँय बने रे संगी , मँय हावंव बाती न।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

गुइया बछरे -बछर ल , जीये हन साथ म।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

      स्वरचित - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
          सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
      
           


Thursday, 28 July 2016

* ये कैसी प्यार की दास्ताँ *

Created by - Teras Kaiwartya (Aansu )

Date - 15/03/1999

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दुनिया में न जाने लोग कैसे हैं ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं।

क्या पनाह मिला हमे ?
बेबुनियाद की वार से ।
अरमाँ की आँसू बह गयी ,
बदली जुबाँ की प्रवाह से ।
चारो ओर छाई काली घटा ,
सुझता नही पास किनारा ।
मानो !अकेला अंत की क्षण ,
दूर तक न दिखे कोई सहारा ।
गला सूखे भय से , सागर सी गहरे लहरें है।

दुनिया में न जाने लोग कैसे है ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं ।

ऐ मेरे परवर दिगार ,
क्यूं मासूम चेहरा छोड़ के गये ?
साथ ले जाता तु अपने ,
फिर क्यूं मुँह मोड़ के गये ?
रस्में तन्हाई में इकरार  ,
तो कभी रुसवाई यहाँ की ।
रस्में बेचैनी से तकरार  ,
यही है जुदाई यहाँ की ।
साँसे बढ़ने लगी है ,विचलित मन बहके -बहके हैं ।

दुनिया में न जाने लोग कैसे हैं ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं ।

आवाज मेरी धड़कन की ,
किसी को आभास नही ।
कामयाबी उन धड़कनों की ,
प्रेम की सरताज नही ।
क्यूं लिखा है नसीब में ?
जीवन की सूर्यास्त होने ,
अब आने लगा करीब में ।
बन्द पड़ने लगी जुबाँ ,आँख से आँसू टपके -टपके हैं।

दुनिया में न जाने लोग कैसे हैं ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं ।

    स्वरचित - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
        सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
         मो.- 9165720460

Wednesday, 27 July 2016

" कमई के फर "

Created by : Teras Kaiwartya (Aansu)
Date : 09/06/2015
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सब्बे कोती हबरे हे आज ,बिग्यान युग के मनई ,
चाहे कछु धंधा होय चाहे किसानी ,अऊ पढ़ई ।
मिलही आही जभे पारी ,नई होय जुच्छा कमई ,
मिलथे भई थीर -थीर ,लऊहा -लऊहा नई मिलय।

     सन्सो झिन कर , बुता कर सुध लमा के,
     पाय बर परथे , कतेक दु:ख ल गवाँ के।
     हदर झिन जांगर , पीत मार कमा के,
     कभू खाबे नून चटनी , कभू रइबे भूखा के।
जिनगी बनाय ल धीरज धरथे ,हिम्मत कर नई गिरय।
मिलथे भई थीर -थीर ,लऊहा -लऊहा नई मिलय।

     येती -ओती झिन गुन , गोठ ककरो चेत म सुन ,
     घेरी -बेरी कमई कर , अही म तय रमा के धुन।
     पथरा म होही चिन्हा , नाव होही तोर जुग-जुग ,
     आस धर के कर संगी , खवाँ सहि झिन रुंध ।
अंतस म पीरा सह के , आँखी म नई रोवय ।
मिलथे भई थीर -थीर , लऊहा-लऊहा नई मिलय।

     बेरा के आघु अऊ ,नसीब ल जादा नई मिलय ,
     सूरुज के उए बिना , फूल घलो बने नई फूलय।
     रद्दा बनाय बिना आघु , कोनो जनउर नई रेंगय ,
     सितोन कमई फर मिलथे , कोनो झपटे नई सकय।
आही अंजोरी तोर बर , अब अंधियारी नई होवय।
मिलथे भई थीर -थीर , लऊहा - लऊहा नई मिलय।

           स्वरचित :- तेरस कैवर्त्य (आंसू )
           सोनाडुला , (बिलाईगढ़ )
           मो. - 9165720460

Sunday, 24 July 2016

' प्रकृति दशा '

Created - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 03/01/2016
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मानव ! स्वयं विनाश को तुले हैं,
जानकार भी अन्जान बन भूले हैं।

वनों की हो रही है दोहन,
जीवों की हो रही है पतन।
हरियाली सिमटने लगी है,
पर्यावरण बिगड़ने लगी है।
ध्यान ! करो ये जीवन की झूले हैं।

पर्वत, नदी, झील बदल रही है,
शनै: शनै: भूमि निगल रही है।
अत्यंत प्रदूषण जोर पकड़ रही है,
आलम हैं विष चहुं पनप रही है।
संवारें ! वादी को, फिर क्यूं सुले हैं।

प्रसाधन की अब अंबार लगी है,
कचरों की देखो बाढ़ लगी है।
प्रति पल संकट बनी हुई है,
जल की स्तर में कमी हुई है।
समाधान ! के बजाय सब रंग में घुले हैं।

निरंतर रही खिलवाड़ प्रकृति की,
कांप रही भू रुदन क्षितिज भी।
संतुलन बिगड़ विकराल हो जाती,
धन-जन की जो विनाश कर जाती।
विपदा ! से जीवन फिर क्यूं रुले हैं।

स्वार्थी मनमाने नशा-पान करे,
स्वयं को भव से राम-नाम करे।
अचरज देखे सब फफक पड़े है,
"आंसू " की बूँद जब टपक पड़े है।
बचाओ ! प्रकृति को अनमोल सजीले हैं।

मानव ! स्वयं विनाश को तुले हैं,
जानकर भी अन्जान बन भूले हैं।

  स्वरचित - तेरस कैवर्त्य (आंसू )
             सोनाडुला, (बिलाईगढ़)
             मोबा.- 9165720460


Saturday, 23 July 2016

" प्रेम वेदना "

  Created By- Teras Kaiwartya(Aansu)
  Date - 13/10/2013 ~ PREM VEDNA ~
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क्यूं पलक में तेरे, चाहे ना ढ़ले अश्रु ,
उर व्यथा से लदे, मेरे नम रहे चक्षु ।
     प्रेयसी से प्रीति है, अतुल अविस्मृति,
     वेदना में सुनयना के, तन क्षीण लगे विकृति ।
लीन है विचरण में, ओ प्रिये सर्व चित्त,
विरक्ति अंश इति पर, जग से परे मृत ।
     कलित चाँदनी छटा की, उद्यत सिर आवृत्ति,
     हँसी रुपसी शिल्पी है, आकृति मन भीत्ति ।
ऐ दिनकर समीर, निहार दें सच युक्ति,
काँटे दें या पुष्प दें, कर तृप्ति या मुक्ति ।
     छोह की फिराक में, तन अर्पण निर्वाण है,
     विक्षिप्त न सूझता कोई, बस तु ही प्रमाण है।
मिटने चला सदी से, दीवानों की रीति है,
अश्क बुंद से लिखा, गिरजा मेरी कृति है।

                स्वरचित :- तेरस कैवर्त्य (आंसू )
                               ग्राम- सोनाडुला,(बिलाईगढ़)
                               जिला- बलौदाबाजार (छ.ग.)
                               मोबा.- 9165720460


कमईया छत्तीसगढ़ीया

हमन निचट गंवईहा, हावन संगी बढ़िया ।
बनी भूति के करईया, हरन छत्तीसगढ़ीया।।

गंवइ गांव के बसोईया, छत्तीसगढ़ी के बोलइया।
दूसर भाखा आये नई, हमर गोठ सुघ्घर भइया।
घाम-घरी म रही-रही, हमर भेस होगय करिया।

हमन निचट गंवईहा, हावन संगी बढ़िया।
बनी भूति के करईया, हरन छत्तीसगढ़ीया।

बड़े बिहनिया उठके, जाथन तरिया नरवा।
लसून मिरचा चटनी संग, खाथन ग पनपुरवा।
का कइबे मिठास येकर, लगथे जब अषड़हा।

हमन निचट गंवईहा, हावन संगी बढ़िया।
बनी भूति के करईया, हरन छत्तीसगढ़ीया।

अब्बड़ सिधवा भइ, पेज पसिया के पियोइया।
नई जानन लन लबारी, छत्तीसगढ़ के रहोइया।
पथरा ढ़ेला के बोहइया, गढ्ढा माटी के खनोइया।

हमन निचट गंवइहा, हावन संगी बढ़िया।
बनी भुति के करइया, हरन छत्तीसगढ़िया।

नइये हयर लेंटर महल, झाला झोपरी के सुतोइया।
चितवा बघवा के डेरा, डोंगरी पहाड़ के रेंगोइया।
नईये अऊ गोड़ म पनही, काँटा खूंटी के गड़ोइया।

हमन निचट गंवईहा, हावन संगी बढ़िया।
बनी भूति के करईया, हरन छत्तीसगढ़िया।

तेंदू चार कोवा मउहा, पुरखा के बिनोइया।
येही डोंगरी झारी हमर, गुजर के चलोइया।
जय जोहार "आंसू " संग, हमर जिनगी के गढ़ोइया।

हमन निचट गंवईहा, हावन सबले बढ़िया।
बनी भूति के कमईया, हरन छत्तीसगढ़िया।

               स्वरचित- तेरस कैवर्त्य (आंसू )
               ग्राम- सोनाडुला, (बिलाईगढ़)
               जिला - बलौदाबाजार (छ.ग.)


Thursday, 21 July 2016

लम्बी सफर है ये जिंदगी, आगे मोड है भारी राह में।
गौर करो जाने मंजिल तक, कुछ खोयेंगे कुछ चाह में।।
                                         तेरस कैवर्त्य (आंसू )