Created By- Teras Kaiwartya(Aansu)
Date - 13/10/2013 ~ PREM VEDNA ~
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क्यूं पलक में तेरे, चाहे ना ढ़ले अश्रु ,
उर व्यथा से लदे, मेरे नम रहे चक्षु ।
प्रेयसी से प्रीति है, अतुल अविस्मृति,
वेदना में सुनयना के, तन क्षीण लगे विकृति ।
लीन है विचरण में, ओ प्रिये सर्व चित्त,
विरक्ति अंश इति पर, जग से परे मृत ।
कलित चाँदनी छटा की, उद्यत सिर आवृत्ति,
हँसी रुपसी शिल्पी है, आकृति मन भीत्ति ।
ऐ दिनकर समीर, निहार दें सच युक्ति,
काँटे दें या पुष्प दें, कर तृप्ति या मुक्ति ।
छोह की फिराक में, तन अर्पण निर्वाण है,
विक्षिप्त न सूझता कोई, बस तु ही प्रमाण है।
मिटने चला सदी से, दीवानों की रीति है,
अश्क बुंद से लिखा, गिरजा मेरी कृति है।
स्वरचित :- तेरस कैवर्त्य (आंसू )
ग्राम- सोनाडुला,(बिलाईगढ़)
जिला- बलौदाबाजार (छ.ग.)
मोबा.- 9165720460
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