Created by - Teras Kaiwartya (Aansu )
Date - 15/03/1999
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झूठ की दरिया में बहते रहते हैं।
क्या पनाह मिला हमे ?
बेबुनियाद की वार से ।
अरमाँ की आँसू बह गयी ,
बदली जुबाँ की प्रवाह से ।
चारो ओर छाई काली घटा ,
सुझता नही पास किनारा ।
मानो !अकेला अंत की क्षण ,
दूर तक न दिखे कोई सहारा ।
गला सूखे भय से , सागर सी गहरे लहरें है।
दुनिया में न जाने लोग कैसे है ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं ।
ऐ मेरे परवर दिगार ,
क्यूं मासूम चेहरा छोड़ के गये ?
साथ ले जाता तु अपने ,
फिर क्यूं मुँह मोड़ के गये ?
रस्में तन्हाई में इकरार ,
तो कभी रुसवाई यहाँ की ।
रस्में बेचैनी से तकरार ,
यही है जुदाई यहाँ की ।
साँसे बढ़ने लगी है ,विचलित मन बहके -बहके हैं ।
दुनिया में न जाने लोग कैसे हैं ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं ।
आवाज मेरी धड़कन की ,
किसी को आभास नही ।
कामयाबी उन धड़कनों की ,
प्रेम की सरताज नही ।
क्यूं लिखा है नसीब में ?
जीवन की सूर्यास्त होने ,
अब आने लगा करीब में ।
बन्द पड़ने लगी जुबाँ ,आँख से आँसू टपके -टपके हैं।
दुनिया में न जाने लोग कैसे हैं ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं ।
स्वरचित - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
मो.- 9165720460
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