Wednesday, 27 July 2016

" कमई के फर "

Created by : Teras Kaiwartya (Aansu)
Date : 09/06/2015
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सब्बे कोती हबरे हे आज ,बिग्यान युग के मनई ,
चाहे कछु धंधा होय चाहे किसानी ,अऊ पढ़ई ।
मिलही आही जभे पारी ,नई होय जुच्छा कमई ,
मिलथे भई थीर -थीर ,लऊहा -लऊहा नई मिलय।

     सन्सो झिन कर , बुता कर सुध लमा के,
     पाय बर परथे , कतेक दु:ख ल गवाँ के।
     हदर झिन जांगर , पीत मार कमा के,
     कभू खाबे नून चटनी , कभू रइबे भूखा के।
जिनगी बनाय ल धीरज धरथे ,हिम्मत कर नई गिरय।
मिलथे भई थीर -थीर ,लऊहा -लऊहा नई मिलय।

     येती -ओती झिन गुन , गोठ ककरो चेत म सुन ,
     घेरी -बेरी कमई कर , अही म तय रमा के धुन।
     पथरा म होही चिन्हा , नाव होही तोर जुग-जुग ,
     आस धर के कर संगी , खवाँ सहि झिन रुंध ।
अंतस म पीरा सह के , आँखी म नई रोवय ।
मिलथे भई थीर -थीर , लऊहा-लऊहा नई मिलय।

     बेरा के आघु अऊ ,नसीब ल जादा नई मिलय ,
     सूरुज के उए बिना , फूल घलो बने नई फूलय।
     रद्दा बनाय बिना आघु , कोनो जनउर नई रेंगय ,
     सितोन कमई फर मिलथे , कोनो झपटे नई सकय।
आही अंजोरी तोर बर , अब अंधियारी नई होवय।
मिलथे भई थीर -थीर , लऊहा - लऊहा नई मिलय।

           स्वरचित :- तेरस कैवर्त्य (आंसू )
           सोनाडुला , (बिलाईगढ़ )
           मो. - 9165720460

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