Created by : Teras Kaiwartya (Aansu)
Date : 09/06/2015
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
सब्बे कोती हबरे हे आज ,बिग्यान युग के मनई ,
चाहे कछु धंधा होय चाहे किसानी ,अऊ पढ़ई ।
मिलही आही जभे पारी ,नई होय जुच्छा कमई ,
मिलथे भई थीर -थीर ,लऊहा -लऊहा नई मिलय।
सन्सो झिन कर , बुता कर सुध लमा के,
पाय बर परथे , कतेक दु:ख ल गवाँ के।
हदर झिन जांगर , पीत मार कमा के,
कभू खाबे नून चटनी , कभू रइबे भूखा के।
जिनगी बनाय ल धीरज धरथे ,हिम्मत कर नई गिरय।
मिलथे भई थीर -थीर ,लऊहा -लऊहा नई मिलय।
येती -ओती झिन गुन , गोठ ककरो चेत म सुन ,
घेरी -बेरी कमई कर , अही म तय रमा के धुन।
पथरा म होही चिन्हा , नाव होही तोर जुग-जुग ,
आस धर के कर संगी , खवाँ सहि झिन रुंध ।
अंतस म पीरा सह के , आँखी म नई रोवय ।
मिलथे भई थीर -थीर , लऊहा-लऊहा नई मिलय।
बेरा के आघु अऊ ,नसीब ल जादा नई मिलय ,
सूरुज के उए बिना , फूल घलो बने नई फूलय।
रद्दा बनाय बिना आघु , कोनो जनउर नई रेंगय ,
सितोन कमई फर मिलथे , कोनो झपटे नई सकय।
आही अंजोरी तोर बर , अब अंधियारी नई होवय।
मिलथे भई थीर -थीर , लऊहा - लऊहा नई मिलय।
स्वरचित :- तेरस कैवर्त्य (आंसू )
सोनाडुला , (बिलाईगढ़ )
मो. - 9165720460
No comments:
Post a Comment