Sunday, 24 July 2016

' प्रकृति दशा '

Created - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 03/01/2016
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मानव ! स्वयं विनाश को तुले हैं,
जानकार भी अन्जान बन भूले हैं।

वनों की हो रही है दोहन,
जीवों की हो रही है पतन।
हरियाली सिमटने लगी है,
पर्यावरण बिगड़ने लगी है।
ध्यान ! करो ये जीवन की झूले हैं।

पर्वत, नदी, झील बदल रही है,
शनै: शनै: भूमि निगल रही है।
अत्यंत प्रदूषण जोर पकड़ रही है,
आलम हैं विष चहुं पनप रही है।
संवारें ! वादी को, फिर क्यूं सुले हैं।

प्रसाधन की अब अंबार लगी है,
कचरों की देखो बाढ़ लगी है।
प्रति पल संकट बनी हुई है,
जल की स्तर में कमी हुई है।
समाधान ! के बजाय सब रंग में घुले हैं।

निरंतर रही खिलवाड़ प्रकृति की,
कांप रही भू रुदन क्षितिज भी।
संतुलन बिगड़ विकराल हो जाती,
धन-जन की जो विनाश कर जाती।
विपदा ! से जीवन फिर क्यूं रुले हैं।

स्वार्थी मनमाने नशा-पान करे,
स्वयं को भव से राम-नाम करे।
अचरज देखे सब फफक पड़े है,
"आंसू " की बूँद जब टपक पड़े है।
बचाओ ! प्रकृति को अनमोल सजीले हैं।

मानव ! स्वयं विनाश को तुले हैं,
जानकर भी अन्जान बन भूले हैं।

  स्वरचित - तेरस कैवर्त्य (आंसू )
             सोनाडुला, (बिलाईगढ़)
             मोबा.- 9165720460


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