Created by- Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 15/07/2014 " राखी "
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राखी राखही बहिनी के समाज ल।
राखी राखही बहिनी के लाज ल।
जियत मरत ले रिश्ता बने हे,
भई - बहिनी के एके अंगना म।
रक्छा करे बर बचन बंधाये,
ये रेशम डोरी के बंधना म।
राखी राखही लछमी के रिवाज ल।
राखी राखही बहिनी के लाज ल।
सुघ्घर थारी सजाके आथे बहिनी,
बाँधय कलई म भई ल मया राखी।
टीका लगाय माथे संग खावै मिठई,
पांव लागी करके भई के आरती ।
राखी राखही बहिनी के लाग ल।
राखी राखही बहिनी के लाज ल।
नई छुटय मया भई - बहिनी के,
कतको दुरिहा ल दउड़ के आथे।
निचट बिपत परे म तको बहिनी,
राखी डाक पार्सल म भेजाथे।
राखी राखही बहिनी के अवाज ल।
राखी राखही बहिनी के लाज ल।
करतब होथे भई के करे बहिनी ल सुरता,
बच्छर दिन म आथे पवितरा तिहार ग।
झिन भूलाहूं भईया ये राखी के रिश्ता,
"आँसू " के कलम करय सबके जोहार ग।
तेरस कैवर्त्य (आँसू )
सोनाडुला (बिलाईगढ़)
मोबाइल -9165720460