नारी जब हँस खुश, फूल झरे मन भीत,
जब कही रूठ गयी, आँखें तो दिखाती है।
नारी है घर की लक्ष्मी, बनी नर की अर्धांग,
चूल्हा चौका कर वही, भोजन खिलाती है।
मन मे रच कविता, जोड़ी राम और सीता,
अपने नसीब मिले, गोरी है या काली है।
कुछ तो है पढ़ी लिखी, कहती है आप बीती,
जैसी हो करीब रहे, खूद घरवाली है।
जिस पर प्रेम लगे, रात दिन खूब जगे,
पिया की झलक एक, पाने को लुभाती है।
भूखे प्यासे व्रत करे, पति की लंबी उमर,
नारी को वंदन करूँ, सच्ची दिलवाली है।
कभी बेटी कभी बहू, बन जाती कहीं सास,
घर छोड़ती अपना, सभी को रुलाती है।
सहन टुटते जभी, बढ़ते है अत्याचार,
देवी शक्ति बन ठान, त्रिशूल उठाती है।
तेरस कैवर्त्य "आँसू"
सोनाडुला (बिलाईगढ़)
जिला - सारंगढ - बिलाईगढ़ (छ. ग.)
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