Saturday, 31 December 2016

*" छत्तीसगढ़िहा मन "*

Created - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 30/12/2016
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
   हावन बड़ सिधवा , हमन छत्तीसगढ़िहा।
   सपटे कस रथन , सुन के दीदी भइया।
   हावन सबले बढ़िया , हमन छत्तीसगढ़िहा।
   कटोरा धान के , सुग्घर मोर भुइंया।

   बेरा जून्ना बीतगे , नवा बच्छर आगिस।2
   हमर बोली ल दरजा , अभी ल नइ दिस।
   कतेक दिन ल हमन लड़बो इहां।
   छत्तीसगढ़ी भाषा बर मरबो इहां।
   मरबो इहां ssss
   नेता मंतरी बइठे इहां परदेशिया।
   हावन बड़ सिधवा , हमन छत्तीसगढ़िहा।

   नइ छोड़न हमन , मर के छइंहा।2
   हमर माटी के कसम हे मंइया।
   जुरमिल के सुनता मढ़ाबो हमन।
   एक दिन हमर हक लुटबो हमन।
   लुटबो हमन ssss
   हमर गोठ के नइये सुनइया।
   हावन बड़ सिधवा , हमन छत्तीसगढ़िहा।
   कटोरा धान के , सुग्घर मोर भुइंया।

     रचना - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
              सोनडुला , (बिलाईगढ़)
         मोबाइल - 9165720460

** मया के छुटई **

Created - Teras Kaiwartya(Aansu)
Date - 18/10/2016 * मया के छुटई *
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    मया म का धराय , मया म पीरा लुकाय हे।
    जेन मया करीस , ओकर मति छरियाय हे।

    सुरता म गती दूनो के , बिगड़े हे संगवारी।
    देखे बर मन तरसे , नइ सुहावय खेती बारी।
    घर के एको मइनसे , मया धुन गम पाय हे।
    न भूख पियास लागे , लकरी सही सुखाय हे।
    
    मया अंधवा होथे , कोनो आंखी म नइ दिखे।
    सुरता दिन भर करके , पाती मया बर लिखे।
    ऐती ओती ल ताकय , पढ़ई ल भूलाय हे।
    देहे बर शोर संदेश , लइका घलो पटाय हे।

    उदिम जादा होगे , रंच रंच गोठ बगरय।
    घर के सियान गुने , बदनामी बर हदरय।
    तरी तरी सगा , टूरी संग बिहा सोरियाय हे।
    फेर समाज के बंधना म , किटकिट ले छंदाय हे।

    खपो दारिन सफ्फा, सगा कहे बने दहेजी दिहा।
    लगन घड़ी नइये तभो , करे चट मंगनी पट बिहा।
    चिंहारी करके मयारु ल, जिन्गी भर रोवाय हे।
    बिछुरे मोर मयारु कइके, 'आँसू ' बड़ बोहाय हे।

    
         रचना - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
                 सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
     जिला - बलौदाबाजार - भा.पा. (छ.ग.)
                  पिन - 493338
   मोबाइल नं.- 9165720460, 7770989795


Thursday, 1 December 2016

** वर्षा की आगमन **

Created by- Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 28/05/2014
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
घुमड़ -घुमड़ के आये बादल,
ठंडी हवाएं लायें हैं।
रिमझिम -रिमझिम बारिश कर ,
धरती की प्यास बुझायें हैं।
          सूरज की भीषण तप से ,
          वृक्ष लता जेठ में झुलस रहे थे।
          पतझड़ बन सूख पड़ी ,
          वह जंगल भी अब पनप रहे हैं।

कोयल की कूक सुहानी , 
उस मौसम को बुलाती है।
पपीहा की राग पीउ -पीउ ,
सभी को खूब लुभाती है।
          मां जन्म भूमि की गोद में ,
          गरजे बरसे बूंदें झम - झम से।
          खुशी से चहके प्यारी चिड़िया ,
           मोर नाचे मन छम - छम से।

किसान सारे हल चलाये ,
खेतों और खलिहानों में।
सुन्दर फसल पेड़ लगाये ,
अपने बाड़ी और बगानों में।
          प्रकृति की मोहक मौसम ,
          क्षण - क्षण में बदल आये हैं।
          कहीं तो यह नव जीवन देती,
          कहीं तो कहर बरपाये हैं।

            रचना :- तेरस कैवर्त्य (आँसू )
           गांव - सोनाडुला, (बिलाईगढ़)
     जिला - बलौदाबाजार - भा.पा. (छ.ग.)
    मोबाइल - 9165720460, 7770989795

" घुटन "

Created by - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 01/10/2001
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जी रहें हैं घुट कर , दर्द अपना दबाये हुए हैं।
हाल सुनाने से पहले , हम खुद सरमाये हुए हैं।।
सहम गया मेरा दिल , नतीजे से वह प्यार के।
अपार टुकड़े हुए है , बेवफ़ाई के तलवार से।।

दो ही कदम चल पाये थे , कि तूफान आ गया।
झपकते ही पलक सामने , नफरमान आ गया।।
गिरा बेवसी मंजिल से , सिर उठाने की काबिल न रहे।
कत्ल हो कातिल हो , मगर ऐसी खपा जालिम न रहे।।


हम ओ बदनसीब है , जो गम के सताये हुए हैं।
दिल देके किसी को हम , खुब पछताये हुए हैं।।
जिंदगी तक रहेगी निशानी , जो धड़कन में बसाये हुए हैं।
यादें तो सदा सताती है , रात-दिन "आँसू" बहाये हुए हैं।।

                रचना - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
           ग्राम -  सोनाडुला , पो - परसाडीह
             तहसील + वि. खं. - बिलाईगढ़
         जिला - बलौदाबाजार-भाटापारा (छ.ग.)
                       पिन - 493338
       मोबाइल - 9165720460, 7770989795
      Email-aansukai4545@gmail.com
      aansukavi.blogs.spot

Wednesday, 23 November 2016

** आत्म कविता **

Created by - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date : 08/09/2010 ,   " आत्म कविता "
******************************
किस कदर मैं यहाँ पर आया हूं ,
          न जाने किस कदर से चला जाऊंगा।
बेवसी से बचपन में सोये रहे ,
          माँ की आँचल में जो ना रोये रहे।

     ओ नसीब न हुआ माँ की साया उठ गयी ,
     शीशू अवस्था में माँ की ममता छुट गयी ।

बहता रहा आँख से ओ पानी ,
          छायी थी मेरी जीवन में विरानी।
न हुआ साथ कोई मेरा हमसफर ,
          चलता रहा अकेला भटकते डगर।

     मिला वह हम साथी , थोड़ी पल के लिए।
     वह भी गली चली , अपनी मुँह मोड़ के प्रिये।

मर - मर के दिल से जीता रहा ,
          दर्दे जख्में जिगर से पीता रहा।
छाया था पिता का वो भी गुजर गया ,
          अनमोल सहारा मुझसे बिछड़ गया।

     पर सामने आये , अड़चन से लड़ना पड़ा।
     सोचा इस कदर मुझे , जीने से मरना भला।

यही तो है जिन्दगी मेरी ,
          किस्मत में खीची ये लकीर है।
टूट कर फिर जीना ,
          आत्मा में बनी ये तस्वीर है।

     खुद ही नही मुझमें , कई आत्मा भी तो है आश्रित।
     करना है पालन रीति , रस्में संस्कार और धार्मिक ।

ऐसी भटकती बीता जीवन मेरा ,
          रोता ही रहा और हँसता ही सहा।
खुशी दिये तो मुझे भगवन ,
          पर मेरा पालक खुशी देखा कहाँ ?

              रचना :- तेरस कैवर्त्य (आँसू )
                  सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
               जिला - सारंगढ़ - बिलाईगढ़ (छ.ग.)
        मोबाइल - 9165720460 , 7770989795




" मेरी है ये जिन्दगी "

Created by - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date : 31/05/1995,
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जिन्दगी ये जिन्दगी ,
           मेरी है ये जिन्दगी।
रास न आये कभी ,
           मेरी है ये बेकसी।

संवारने लगी थी , दिल को वो कभी ।
रानी थी सपनों की , मेनका और उर्वशी।
कहाँ को ढूंढू उसे , कहाँ से लाऊं उसे।
वो दिल में किसी , और की बसी।
जिन्दगी ये जिन्दगी .............................

मन मन्दिर सुनी पड़ी , रही थी जो मेरी कली।
अपने दुनिया छोड़ के ,जाने लगी दूसरी गली।
'आँसू ' की खून बहा के , धड़कन में कटार चला के।
पर क्यूं प्रियतम , बेवफा दुल्हन बनी।
जिन्दगी ये जिन्दगी ...............................

देखते ही रह गये , हाथ से हाथ मली।
जुदाई के तलवार से , दे दी प्रेम की बली।
घायल दिल टूट गया , चमकता सूरज डूब गया।
उजाले की पथ से , जीवन की रोशनी ढ़ली।

जिन्दगी ये जिन्दगी ,
           मेरी है ये जिन्दगी।
रास न आये कभी ,
           मेरी है बदकिस्मती।

            रचनाकार - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
                 सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
       जिला - बलौदाबाजार - भाटापारा (छ.ग.)
      मोबाइल :- 9165720460, 7770989795


Tuesday, 22 November 2016

" काबर रानी तैं छोड़े "

Created by-Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 13/07/1999 "काबर रानी तैं छोड़े"
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
     बनाये खोंधरा अपन बर मैना ओ,
     मया संग ल छोड़ के उड़ाये हे।
     निरमोही पियास बूझा के अपन,
     मया ल बैरी कस आगी जलाये हे।

तोर सुरता के पीरा म, मय भहर गेहव रे,
काबर रानी तै छोड़े, मय तो मर गेहव रे।
     मया के मोहनी पिया के मोला ,
     पाछू लहुट नइ देखेव ओ ।
     छाती म तंय बान चलाये ,
     दुल्हन बन के रेंगेव ओ।
     जीहां-जीहां तंय पांव पखारे,
     तीहां-तीहां आँसू ढारे ओ।
     कहां उड़ाये मोर सोन चिरइयां,
     डोंगरी शहर निहारें ओ।
नइ मिलेय तैं मोर मयारु 2
मय हदर गेहव रे,
काबर रानी तैं छोड़े, मय तो मर गेहव रे।

     हाथ रमजत गुनत-गुनत,
     तन ल घुना मोर खागे ओ।
     मुंह सुखागे ठाढ़ करियाये,
     लकरी सही सुखागे ओ।
     करे उपाय मोला हंसाये,
     नइ पतझड़ हरियाये ओ।
     मन के सपना आधा रहिगे,
     मया गिरजा के नइ पायें ओ।
सुरता के ओढ़ना ओढ़े 2   
मय तो जर गेहव रे,
काबर रानी तैं छोड़े, मय तो मर गेहव रे।
           
           रचना - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
               सोनाडुला, (बिलाईगढ़)
       जिला - बलौदाबाजार - भा.पा. (छ.ग.)
       मोबाइल - 9165720460, 7770989795
      Email - aansukai4545@gmail.com

* मोला अंग-अंग म बसाले *

Created by -Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 27/10/2011 "मोला अंग-अंग म बसाले"
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मोला अंग-अंग म बसाले, मोला सोलह सिंगार बनाले।
रही-रही सुरता आही मया, झन आँखी ल आँसू बोहाबे।
    माथे म टिकली मोला लगाले,
    अउ माँग सेंदूर सजाले।
    मन म ढांक के मया ल मोरे,
    सब्बो दिन बर तय लुकाले।
    बना ले न संगी कान के बाली,
    रचा ले न बही ओठ म लाली।
    बिता ले न ओ संग संगवारी,
    बन के जम्मो दिन बर घरवाली।
मोला अंग-अंग म बसाले, मोला सोलह सिंगार बनाले।
रही-रही सुरता आही रानी, झन आँखी ल आँसू बोहाबे।
    नथली नाक म मोला पहिर ले,
    ओढ़ के साड़ी पूरा बदन ले।
    रखि ले अंचरा म मोला बांध के,
    तोर बर हव जावर जोड़ी जान ले।
    हाथ के चुरी तोर बन जाथेव,
    कनिहा म करधन मय सज जाथेव।
    पांव के पैंरी जब बन जाथेव,
    छुनूर-छुनूर रेंग के बज जाथेव।
मोला अंग-अंग म बसाले, मोला सोलह सिंगार बनाले।
रही-रही सुरता आही रानी, झन आँखी ल आँसू बोहाबे।
    बना के गर म रखि ले नौलखिया हार,
    जनम भर बनथे तोर कड़ा सोन के ढार।
    सगरो सुहागिन रइबे मयारु,
    जीव के तय मोरे अधार।
    ककनी बनुरिया हाथ के आँखी के मय कजरा,
    गोड़ म माहुर रचाले संग केश के गजरा ।
    पीरा नइ जाने अंतस के मया करे जे लबरा,
    आनी-बानी लिगरी लगा करे गोठ के बदरा।
मोला अंग-अंग म बसाले, मोला सोलह सिंगार बनाले।
रही-रही सुरता आही रानी, झन आँखी ल आँसू बोहाबे।
    सज जाथेव बन के गुइया तोर अंगठी के मुंदरी,
    सोलह सिंगार सजे रचे हे मोर रानी ओ सुंदरी।
    मुड़ कोरा ले बेनी गथाले अउ धरे लाली चुनरी,
    तन मन म मोर नाव लिखा ले 'आँसू ' के पुतरी।
मोला अंग-अंग म बसाले, मोला सोलह सिंगार बनाले।
रही-रही सुरता आही रानी, झन आँखी ल आँसू बोहाबे।

               रचना - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
                      सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
           जिला - बलौदाबाजार - भाटापारा (छ.ग.)
        मोबाइल - 9165720460, 7770989795
     


Tuesday, 25 October 2016

** दीवाली ** (देवारी)

Created by :- Teras Kaiwartya (Aansu)
Date : 15/10/2016, Diwali (देवारी)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
     सुन संगवारी करव तियारी।
     जुरमिल तिहार मनाबो देवारी।

     खोहार होगय जर के सोन के लंका।
     रावण कुल के नाश करीस रघुराई ।
     एकरे सुरता म मनाथे सबो दशहरा।
     सत के जीत होइस असत ल हराई।

     झारव-झारव , पोछव-पोछव जी।
     कुरिया मन के , अउ मुँह दुवारी।
     आनी बानी मीठ , रंग लिपाबोन।
     आगे हमर ये , अब सुग्घर देवारी।

     आइस लहुट बनवासी , राम रतन।
     मेटा दीन बैरता , गरब के अंधियारी।
     बनाबोन आयोध्या , काया नगरी ल।
     सुनता के दीया जला , करबो उजियारी।
 
     सत के मिठाई , गोठ बाँहटव भाई।
     जोरिया के रहव , झिन करव लबारी।
     सिरजा लीन अंतस, अपन मया पिरीत के।
     तभे रमही घर म , लछ्मी महतारी।

     जोहार करबोन , महादेवा पार्वती के।
     लइका कुटुंब जम्मो , संग सजा के थारी।
     हमरो रक्छा करव , पहरा देवा गोवर्धन।
     जगाव सुख के बिरवां , पोछव आँसू के पानी।

     किसम-किसम के , फूलझरी फटाका
     गली खोल होवय , रथिया अंजोर भारी।
     जुगूर- बुगूर दीया बार, गाँव सरग बनाबोन।
     रंग-रंग नवा कपड़ा संग , फूलय फूलवारी।

     सुन संगवारी करव तियारी।
     जुरमिल तिहार मनाबो देवारी।

         रचना :- तेरस कैवर्त्य *आँसू *
                  सोनाडुला, (बिलाईगढ़)
       जिला - बलौदाबाजार - भाटापारा (छ.ग.)
      मोबाइल - 9165720460, 7770989795

Sunday, 25 September 2016

-: साक्षर बनें :-

Created by :- Teras Kaiwartya (Aansu)
Date :- 08/09/2012 , * साक्षर बनें *
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

दीदी भईया आओ , पढ़ना लिखना हम सीखें ।
क ख ग घ को हथियार , बनाकर लड़ना सीखें।

उठो जागो बढ़ो आगे , अब ना रहेंगे हम पीछे ।
बढ़ी है नारी शक्ति , अब नहीं रहेंगे हम नीचे ।

फेकें समाज अब तक , जूल्म हम पर कई छीटें ।
साक्षरता की दीप जलाओ , किसी से ना हम झूकें।

जीवन को सुदृढ़ बनाने , गढ़े यह हम तरीके ।
भाग्य जगाने चले अब , बच्चे बूढ़े सभी के ।

नारी पढ़के जीद पे अड़के , कई काम को जीते।
साक्षर भारत बने देश , शिक्षा में जब हम जुटें ।

आह्वान है मेरी बहनो से , अपने भारत के समूचे।
शोषित मुक्त बनेंगे , ना रहें हम खीचे - खीचे ।

दीदी माई आओ , अधिकार अपना हम लूटें ।
अ आ इ ई को ढ़ाल , बनाकर बचना हम सीखें।


     रचनाकार :- तेरस कैवर्त्य (आँसू )
                  सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
                मोबाइल - 9165720460

पीरा मया के

Created:- TERAS KAIWARTYA(Aansu)
Date :- 18/07/2005 , * पीरा मया के *
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
     ये मन बिरथा,
     तय हर भूला जा ओला रे।
     काबर घेरी - बेरी सुरता ल करस।
     ये करम फूटगे ,
     बाचय नई अब तो चोला रे ।
     भभके आगी अंगरा अंतस म जरस ।

     तोर अंतस म पीरा भरे हे ,
     सुध लगाये सब्बो बेरा म , हो ...
     बैरी बना देहे मोला रे संगी ,
     मुरछ चलय तोर डेरा म ,
     कोन गोहराव काला बतावव - 2
     ए आँसू  के रोना रे ,
     करलइ होवव करय नई कोनो ये तरस।
     ये मन बिरथा ..................

     सकलाये तय पांखी मयारु ,
     मोर मोहनी ये हीरा रतन , हो ...
     छोर के टाटी मन के मोरे ,
     जोरे मया दूसरे के संग ,
     जा निरमोही मया छोर के डोरी -2
     सजे हवय तोर डोला रे ,
     सुग्घर जीबे संगी बने जिंगी ल गढ़त ।
     ये मन बिरथा ...................

        रचनाकार :- तेरस कैवर्त्य (आँसू )
                      सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
                    मोबाइल - 9165720460
                                  7770989795

** माँ की ममता **

Created by :- Teras Kaiwartya (Aansu)
Date :- 10/05/1996,  " Love of Mother "
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बड़ी अनमोल है , दुनिया में जिनकी है माँ ।
बढ़कर न मिलेगी , कहीं दूजा और कहाँ ?
चले गये कहीं टुकड़ा , जिगर का भी जहाँ ।
ब्याकुलता रह जाती , करती ममता की बयाँ ।

      निद्रा न आये न भूख सताये , प्यारी है वह माँ ।
      लौट न आये बेटा , ढूँढने लगी यहाँ - वहाँ ।
      सीने से लगा के , बरसे ममता की घटा से ।
      पिता भले डाटते , मगर सदा रहती बचाते ।

नव माह गर्भ से मुक्त , माँ  गोद में खिलावे ।
तारा है प्यारा आँख का , स्तन रस पिलावे ।
प्रथम गुरु है माता , आदर संस्कार सिखावे ।
चुप कराने गाती लोरी , शीशू को जब सुलावे ।

      पेट भरा न बेटा के , तब मुख में अन्न न जावे ।
      खुद भूखी सोती पर , पुत्र को जलपान करावे ।
      नहीं हैं जननी जिनकी , उन्हें बड़ा ही मलाल है ।
      सारी सुख मिले पर भी , माँ बिना अंधकार है ।

                   स्वरचित :- तेरस कैवर्त्य (आँसू )
                               सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
                            जिला :- बलौदाबाजार (छ.ग.)
                                   पिन :- 493338
                           संपर्क सूत्र :- 9165720460
                                             7770989795

Tuesday, 13 September 2016

" माटी के रचना "

Created By : Teras Kaiwartya(Aansu)
Date : 08/12/2015
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कोनो ले जाही झिन कोड़ के ,
मोर छत्तीसगढ़ भुइयां के माटी।

झरर-झरर गिरही आँखी ल पानी ,
फाट जाही मोर करेजा के छाती।
थिरक जाही खूनूर-खूनूर ,
बाजे ल गोड़ के साँटी।

कोनो ले जाही झिन कोड़ के ,
मोर छत्तीसगढ़ भुइयां के माटी।

नइ करही धूकूर-धूकूर ,
चलय ल नाक के साँसी।
उड़ जाही मन के परेवना ,
उघार खोंधरा मया के टाटी।

कोनो ले जाही झिन कोड़ के ,
मोर छत्तीसगढ़ भुइयां के माटी।

जाय बर हावय सब्बो ल ,
छोड़ बेटा-बहू घर नाती।
झिन रोबे ये दुलरवा भई ,
आही सुरता मोर दिन राती।

कोनो ले जाही झिन कोड़ के ,
मोर छत्तीसगढ़ भुइयां के माटी।

पाँच  तत्व येमा जाही मिंझर ,
गड़बे भुइयां म अउ जरबे साथी।
रचना माटी के ओढ़ना दसना ,
"आँसू " संग जम्मो हो जाही माटी।

          तेरस कैवर्त्य "आँसू "
        सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
        मोबा.- 9165720460




Monday, 12 September 2016

* मोला रंगा ले *

Created by :- Teras Kaiwartya*Aansu*
Date :- 13/10/2014  
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मोला रंगा ले रंग म ओ।
मोला रंगा ले संग म ओ।
मया म होगेव तोरे दीवाना,
बसा ले न अंग-अंग म ओ।
      माथ के टिकली,चमकत बिजली ।
      मांगे म मोती सजा ले।
      कान म बाली, ओठ के लाली।
      गजरा बेनी म बनाले।
      अचरा म बांध ले झिन भूलाबे।
      लगा ले जम्मो रतन म ओ।
मया म होगेव तोरे दीवाना।
बसा ले न अंग-अंग म ओ।
      मया के पैंरी, बजाले खुन-खुन।
      हाथ के बन जाथे कंगना।
      सोलह सिंगार तय मोरे अधार।
      आबे रानी मोरे अंगना।
      आनी-बानी दिखा के सपना।
      रचे हावस मोरे मन म ओ।
मया म होगेव तोरे दीवाना।
बसा ले न अंग-अंग म ओ।
मोला रंगा ले रंग म ओ।
मोला रंगा ले संग म ओ।
           तेरस कैवर्त्य "आँसू "
         सोनाडुला, (बिलाईगढ़)  

Thursday, 8 September 2016

* आगिस भादो कुवांर महीना *

आगिस भादो के महीना।
गिनावत थे जम्मो के महिमा।
     सावन आइस हरेली लेके जटाधारी।
      आगिस कमरछट कन्हैया के झुलानी।
धो मांज के बइला ल सजाबोन।
पूजा कर सांझी पोरा पटकाबोन।
      भाँटो के देख अंतस अकुलागे।
      तीजा ल बहिनी के लेनहार आगे।
निरजला उपास रहिथे करु भात खाके।
फरहार करे बर घेरी-बेरी बेरा ल ताके।
      हमर लाज के रखइया हे गणराज।
      घर गली चउक म करय बिराज।
कुँवार जोत जले गाबोन नवराति।
माता के भुवन सजे बिहान संझाती।   
      कांसी फूल गे चुंदी सादा लागे।     
      लगतथे अइसन बरखा बूढ़ागे। 
धान के कोरा म पोटरी सिरजागे।
खुशी के "आँसू" आँखी म आगे।


         तेरस कैवर्त्य "आँसू "
        सोनाडुला,(बिलाईगढ़)
       मोबा.- 9165720460
email - aansukai4545@gmail.com
     

Sunday, 14 August 2016

** राखी **

Created by- Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 15/07/2014   " राखी "
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
राखी राखही बहिनी के समाज ल।
राखी राखही बहिनी के लाज ल।

     जियत मरत ले रिश्ता बने हे,
     भई - बहिनी के एके अंगना म।
     रक्छा करे बर बचन बंधाये,
     ये रेशम डोरी के बंधना म।

राखी राखही लछमी के रिवाज ल।
राखी राखही बहिनी के लाज ल।

     सुघ्घर थारी सजाके आथे बहिनी,
     बाँधय कलई म भई ल मया राखी।
     टीका लगाय माथे संग खावै मिठई,
     पांव लागी करके भई के आरती ।

राखी राखही बहिनी के लाग ल।
राखी राखही बहिनी के लाज ल।

     नई छुटय मया भई - बहिनी के,
     कतको दुरिहा ल दउड़ के आथे।
     निचट बिपत परे म तको बहिनी,
     राखी डाक पार्सल म भेजाथे।

राखी राखही बहिनी के अवाज ल।
राखी राखही बहिनी के लाज ल।

     करतब होथे भई के करे बहिनी ल सुरता,
     बच्छर दिन म आथे पवितरा तिहार ग।
     झिन भूलाहूं भईया ये राखी के रिश्ता,
     "आँसू " के कलम करय सबके जोहार ग।


                       तेरस कैवर्त्य (आँसू )
                     सोनाडुला (बिलाईगढ़)
                   मोबाइल -9165720460

Wednesday, 10 August 2016

* प्रेम दमन *

Created by - TERAS KAIWARTY (AANSU)
Date - 13/10/2015, •Prem Daman•
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
यादें जिंदगी भर को मुझे गमी बना दिया।
किसी की बेवफ़ाई ने मुझे कवि बना दिया।

सहज ही नहीं लिख सकता था ऐसा अल्फाज।
चल पड़ी मेरी लेखनी गिरते जुदाई की गाज।

ऐसा मंजर ढ़ाया चमन पर तूफान आकर।
मेरे महकते वादी पर गिरे भूचाल आकर।

हँसती खिलती फूल में खुश्बू पास न आया।
मेरा सच्चा प्यार किसी को रास न आया।

चंद पल में सजाये मन मंदिर बर्बाद हो गया।
खुशी की सपना संजोये दाग-दाग हो गया ।

मेरे दिल पर बन गया था ओ महलताज।
शाहजहाँ रहा मैं वह थी मेरी मुमताज।

अब भी उस मुरत की दिल से पूजा करता हूँ।
गुंजते आवाज कानों में आसपास ढूढ़ा करता हूँ।

एक जनम तो क्या प्यार कभी नहीं मिटेगा।
सात जनम तो क्या जन्मों तक नहीं टुटेगा।

बस ! प्यार की रुसवाई मेरे कफ़न में जायेगी।
"आँसू " की सिसकियाँ सदा दफन हो जायेगी।

                           तेरस कैवर्त्य (आँसू )
                         सोनाडुला (बिलाईगढ़)
                      मोबाइल - 9165720460

Thursday, 4 August 2016

* पल बीत जाती है *

Created by - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 03/11/2013
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
कल को आज से, आज को अभी से,
काम कर अपना , भविष्य बनाने को।
क्योंकि पल बीत जाती है, 
ना करो कुछ बहाने को।

     कर्म प्रधान है मान ले बन्दे ,
     करते जाओ सब लम्बे-लम्बे।
     फल की चिन्ता ना तु करना ,
     संकट से फिर ना तु डरना ।
खोना पड़ता है , रोना पड़ता है।
जीवन में कुछ पाने को , 
क्योंकि पल बीत जाती है ,
ना करो कुछ बहाने को।

     हिम्मत से खरे उतरना ,
     वादे से फिर नही मुकरना।
     जाना है तुम्हें उस मंजिल पर ,
     साँस लगा दें बस काबिल पर।
दम हैं तुझमे , कम ना किसी से।
कर दो नाम जमाने को ,
क्योंकि पल बीत जाती है ,
ना करो कुछ बहाने को।

           तेरस कैवर्त्य (आँसू )
         सोनाडुला (बिलाईगढ़)
         मो. - 9165720460


* कल्पना "आँसू " की *

Created by - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 05/06/1995 "कल्पना "
***********************************
आप अत्यंत आकर्षक हो।
आप में आकर्षण हैं।
आप से आकर्षित हूँ।
आसमान की घटा है ,
तेरी रेशमी जुल्फें।
धरती की छटा है ,
तेरी मिलकती पलकें।
हरी मदमाती यौवन से ,
ओस की कण भी छलके।
आँखें हैं झील सी तेरी ,
भौंह में लकीर की घेरी।
मुख मण्डल की कोमलता ,
होंठ गुलाब की फूल है।
मुस्कान उसकी पंखुड़ी ,
निगाहें बड़ी सुकून है।
सुरत तेरी चाँद है ,
बिंदिया सूरज की लाली।
साँसें सुहानी खुश्बू से ,
भरी बहती पुरवाई है।
सुराहीदार गर्दन तेरी ,
बाँहें शक्त ओर तेज है।
लचकती पतली कमर ,
बुलबुल की चंचल चाल है।
दो गोल कलाईयां ,
सोने पे सुहागा है।
सुडौल जंघा आग सी ,
दहकती अंगारे है।
रोम तेरी वह सावन की ,
हरियाली दुब है।
गदराई उभे संतरे ,
धड़कन को छुने लगी है।
पायल की झंकार तेरी ,
कुदरत को भ्रमित कर दी है
तुम्हें बनाने वाले ने ,
तरासी होगी बड़ी फुरसत से।
परी मेनका और उर्वशी को भी मात कर दी ,
वाह ! मेरी कल्पना हुस्न की मलिका...

               तेरस कैवर्त्य (आँसू )
             सोनाडुला (बिलाईगढ़)
               मो.-9165720460


Wednesday, 3 August 2016

" ये मेरे वतन के साथियों "

Created by -Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 15/08/2000
"""""""""""""""""""""""""""""""""""
ये मेरे साथियों, ये मेरे भारतीयों।
इस मिट्टी को शत-शत नमन कर लो।
जरा सोच के, हौसला बुलंद कर लो।

अपना,अपना ही होता है, हर सब के लिए।
जान देना सीखो तुम, वतन के लिए।
निर्भय से संकट को,
देश द्रोही कलंक को दमन कर दो।
जरा सोच के, हौसला बुलंद कर लो।

दुश्मन अपने ही, मुल्क में डेरा करे।
जागो पहले तुम, जब ओ अंधेरा करे।
ना हटो तुम पीछे,
ना डरो खून छीटें, उसे खतम कर दो।
जरा सोच के, हौसला बुलंद कर लो।

कब तक सहते रहोगे, उनके जुल्में सितम।
बाँध के दौड़ो सिर पे, सब तुम भी कफन।
ना डरें बुढ़े बच्चे,
ना हिले पेड़ पत्ते, तन अर्पण कर दो।
जरा सोच के, हौसला बुलंद कर लो।

ये मेरे साथियों, ये मेरे भारतीयों।
इस मिट्टी को, शत-शत नमन कर लो।
जरा सोच के, हौसला बुलंद कर लो।

             तेरस कैवर्त्य (आँसू )
            सोनाडुला (बिलाईगढ़)
      जिला - बलौदाबाजार-भा.पा.(छ.ग.)
           मोबाइल - 9165720460




* आँसू का अल्फाज *

Created by -Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 20/12/2013,  (आँसू की अल्फाज )
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अनुपम अभिजात अध्यापक आकर्षण आधार है।
अमृत अक्षर अनेक आदर्श आचार है।
अति अथक अभय आशय आकार है।
अलग अकथ अभिप्राय आदि आवाज है।
अब अवलि अगम आदरणीय आदाब है।
अगर अधर अचेत आज आंकलन आप है।
अंग - अंग अंगड़ाई ओझल अंबर आश है।
आरजू अंदर अमर अचल आँसू अल्फाज है।

          तेरस कैवर्त्य (आँसू )
       सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
      मोबाइल - 9165720460

** मुस्कान **

Created - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 02/02/2002  * MUSKAN *
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मुस्कान एक कला है।
मुस्कान एक अदा है।
मुस्कान से जन्नत फिदा है।
मुस्कान गजब अनोखा है।
मुस्कान चेहरे की शोभा है।
मुस्कान मुख की चमक है।
मुस्कान खुशी की झलक है।
मुस्कान कुदरत की देन है।
मुस्कान चाहत भरी प्रेम है।
मुस्कान सुख की आशा है।
मुस्कान प्रेम की भाषा है।
मुस्कान से छुपा राज है।
मुस्कान में कुछ खास है।

       तेरस कैवर्त्य (आँसू )
     सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
     मोबा .- 9165720460

Monday, 1 August 2016

* बहते आँसू *

Created By - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 05/10/2015
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
करुण फलक पे गिले आँसू ,
पलक झपकते गिरे आँसू ।

          पीड़ा बयाँ कर नीर नमकीन ,
          रुदन स्वरमय ली गमगीन ।
          ईश धरा पर अनन्य दीन , 
          माँ या धन भार्या में लीन।।

राज संगम पर मिले आँसू ,
दु:ख अर्ध जब धूले आँसू ।

          सहज ही क्यूं बहते नयन से ,
          अपनों की जब हो गमन से।
          दो बूँद की संबंध जनम से ,
          लाल जोड़े या श्वेत कफन से।।

घुटन सह अब पीले आँसू  ,
सिसकियां तक हिले आँसू ।

          स्मरण सदा करो जन प्यारे ,
          कर चलें फ़िदा हमें बे सहारे।
          कामना फिर आना मध्य हमारे ,
          नाम अमर कर लें जयकारे।।

स्मृति चिता संवार किये आँसू ,
विदा कर बहते अब दिये आँसू ।

                तेरस कैवर्त्य (आँसू )
              सोनाडुला , (बिलाईगढ़ )
              मोबा.- 9165720460


** कलम की धार **

Created by - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 01/01/2016
****************************
ये कलम की धार आभार लिखती है ।
दयानिधि गुरुओं को प्रणाम लिखती है।
     मीरा ,राधा से श्याम तक ,
     हीर - राँझा से शिरी - फरहाद तक ,
प्राचीन से वर्तमान तक , यह प्यार दिखता है ,
ये कलम की धार दीदार लिखती है।
     अर्जून, से औरंगजेब तक ,
     कुरुक्षेत्र से चित्तौड़ तक ,
रजनी से प्रभात तक , इतिहास लिखती है।
ये कलम की धार क्या - क्या बात लिखती है।
     बेबस लाचार अमीरों का , 
     साधु - संत फकीरों का ,
विद्या दाता, कवियों का , हाव -भाव लिखती है।
ये कलम की धार हाल - चाल लिखती है।
     नभ जमी सर्व अवतार का ,
     सात समुन्दर पार का ,
नमी हवा अंगार का , आकार खिंचती है।
ये कलम की धार पहचान लिखती है।

प्रथम स्थान गुरु का, स्वयं भगवान लिखते है।
ये कलम की धार वाह - वाह लिखती है।
ये कलम की धार बार - बार लिखती है।

             तेरस कैवर्त्य (आँसू  )
           सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
        जिला - बलौदाबाजार (छ.ग.)
मोबाइल - 9165720460,7770989795

Saturday, 30 July 2016

** याद करना मुझे **

Created by - Teras Kaiwarta (Aansu)
Date - 16/10/2004
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जब चले जायेंगे , याद करना मुझे।
रहो हंसते सदा , रो -रोकर ना रुठे।

     अब तक तुम बीच हमसे शरारत हुई ,
     बिगड़े शिकवे गिला या करामत हुई ।
     जो हुआ सो मैं उनका गुनहगार हूँ ,
     सजा पाने को मैं तो भी  तैयार हूँ ।
भूल जाना मुझे , नाज करना मुझे।
जब चले जायेंगे , याद करना मुझे।

     नाम लेने से मेरा , गला भर आयेंगे ,
     सपने में आँख से ,आँसू बह जायेंगे।
     संग छोड़ गयी , तुने इस साथी का ,
     साथ ना रहे कोई , अब मुसाफिर का।
करुं विनय तुझे , दाग करना मुझे।
जब चले जायेंगे , याद करना मुझे।

     हर महीने मे तेरह , तेरस आते रहेंगे ,
     राग मेरे ऐ काश , गुनगुनाते रहेंगे।
     उम्र ढल ही गयी , ये साँस संसार से ,
     फासला हो चली ,अब घर परिवार से।
बीते कल चार पल , हाथ करना मुझे ।
चीता की शैय्या में , आग करना मुझे ।

जब चले जायेंगे , याद करना मुझे।
हों तो अंंतर्मन  मे , राज करना मुझे ।

         तेरस कैवर्त्य (आँसू )
        सोनाडुला,(बिलाईगढ़ )
          मो.- 9165720460

Friday, 29 July 2016

* कल्पत आँसू *

Created by -Teras Kaiwartya (Aansu)
Date -13/10/2014
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
गुइया बछरे -बछर ल, जीये हन साथ म।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

दुनिया के रीत हावय , आना अऊ जाना ओ।
मया पिरीत जतन के , जिनगी बिताना ओ।
आँसू झिन बोहाबे रे संगी ,अपन आँखी म।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

सुरता के डोरी बँधा के , गुनत झिन रइबे ओ।
मने मन मा मोला झूला के , मया मोर भुलइबे ओ।
पथरा बनाले रे संगी , तय अपन छाती ल।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

किरिया खाये रहे जोही , संगे जीबो मरबो ओ।
आनी -बानी सपना दिखा , कहे नइ बिछरबो ओ।
मुरछ देबे का रे संगी , मँय लगाहूं फाँसी ल।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

आँसू -आँसू तय मोर आँसू , मय तोर आँसू ओ।
जियत भर लुकाय लेबे , करेजा के पाछू ओ।
दीया तँय बने रे संगी , मँय हावंव बाती न।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

गुइया बछरे -बछर ल , जीये हन साथ म।
अब निकलथे जिवंरा , तन जाही माटी म।

      स्वरचित - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
          सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
      
           


Thursday, 28 July 2016

* ये कैसी प्यार की दास्ताँ *

Created by - Teras Kaiwartya (Aansu )

Date - 15/03/1999

•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••


दुनिया में न जाने लोग कैसे हैं ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं।

क्या पनाह मिला हमे ?
बेबुनियाद की वार से ।
अरमाँ की आँसू बह गयी ,
बदली जुबाँ की प्रवाह से ।
चारो ओर छाई काली घटा ,
सुझता नही पास किनारा ।
मानो !अकेला अंत की क्षण ,
दूर तक न दिखे कोई सहारा ।
गला सूखे भय से , सागर सी गहरे लहरें है।

दुनिया में न जाने लोग कैसे है ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं ।

ऐ मेरे परवर दिगार ,
क्यूं मासूम चेहरा छोड़ के गये ?
साथ ले जाता तु अपने ,
फिर क्यूं मुँह मोड़ के गये ?
रस्में तन्हाई में इकरार  ,
तो कभी रुसवाई यहाँ की ।
रस्में बेचैनी से तकरार  ,
यही है जुदाई यहाँ की ।
साँसे बढ़ने लगी है ,विचलित मन बहके -बहके हैं ।

दुनिया में न जाने लोग कैसे हैं ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं ।

आवाज मेरी धड़कन की ,
किसी को आभास नही ।
कामयाबी उन धड़कनों की ,
प्रेम की सरताज नही ।
क्यूं लिखा है नसीब में ?
जीवन की सूर्यास्त होने ,
अब आने लगा करीब में ।
बन्द पड़ने लगी जुबाँ ,आँख से आँसू टपके -टपके हैं।

दुनिया में न जाने लोग कैसे हैं ?
झूठ की दरिया में बहते रहते हैं ।

    स्वरचित - तेरस कैवर्त्य (आँसू )
        सोनाडुला , (बिलाईगढ़)
         मो.- 9165720460

Wednesday, 27 July 2016

" कमई के फर "

Created by : Teras Kaiwartya (Aansu)
Date : 09/06/2015
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
सब्बे कोती हबरे हे आज ,बिग्यान युग के मनई ,
चाहे कछु धंधा होय चाहे किसानी ,अऊ पढ़ई ।
मिलही आही जभे पारी ,नई होय जुच्छा कमई ,
मिलथे भई थीर -थीर ,लऊहा -लऊहा नई मिलय।

     सन्सो झिन कर , बुता कर सुध लमा के,
     पाय बर परथे , कतेक दु:ख ल गवाँ के।
     हदर झिन जांगर , पीत मार कमा के,
     कभू खाबे नून चटनी , कभू रइबे भूखा के।
जिनगी बनाय ल धीरज धरथे ,हिम्मत कर नई गिरय।
मिलथे भई थीर -थीर ,लऊहा -लऊहा नई मिलय।

     येती -ओती झिन गुन , गोठ ककरो चेत म सुन ,
     घेरी -बेरी कमई कर , अही म तय रमा के धुन।
     पथरा म होही चिन्हा , नाव होही तोर जुग-जुग ,
     आस धर के कर संगी , खवाँ सहि झिन रुंध ।
अंतस म पीरा सह के , आँखी म नई रोवय ।
मिलथे भई थीर -थीर , लऊहा-लऊहा नई मिलय।

     बेरा के आघु अऊ ,नसीब ल जादा नई मिलय ,
     सूरुज के उए बिना , फूल घलो बने नई फूलय।
     रद्दा बनाय बिना आघु , कोनो जनउर नई रेंगय ,
     सितोन कमई फर मिलथे , कोनो झपटे नई सकय।
आही अंजोरी तोर बर , अब अंधियारी नई होवय।
मिलथे भई थीर -थीर , लऊहा - लऊहा नई मिलय।

           स्वरचित :- तेरस कैवर्त्य (आंसू )
           सोनाडुला , (बिलाईगढ़ )
           मो. - 9165720460

Sunday, 24 July 2016

' प्रकृति दशा '

Created - Teras Kaiwartya (Aansu)
Date - 03/01/2016
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मानव ! स्वयं विनाश को तुले हैं,
जानकार भी अन्जान बन भूले हैं।

वनों की हो रही है दोहन,
जीवों की हो रही है पतन।
हरियाली सिमटने लगी है,
पर्यावरण बिगड़ने लगी है।
ध्यान ! करो ये जीवन की झूले हैं।

पर्वत, नदी, झील बदल रही है,
शनै: शनै: भूमि निगल रही है।
अत्यंत प्रदूषण जोर पकड़ रही है,
आलम हैं विष चहुं पनप रही है।
संवारें ! वादी को, फिर क्यूं सुले हैं।

प्रसाधन की अब अंबार लगी है,
कचरों की देखो बाढ़ लगी है।
प्रति पल संकट बनी हुई है,
जल की स्तर में कमी हुई है।
समाधान ! के बजाय सब रंग में घुले हैं।

निरंतर रही खिलवाड़ प्रकृति की,
कांप रही भू रुदन क्षितिज भी।
संतुलन बिगड़ विकराल हो जाती,
धन-जन की जो विनाश कर जाती।
विपदा ! से जीवन फिर क्यूं रुले हैं।

स्वार्थी मनमाने नशा-पान करे,
स्वयं को भव से राम-नाम करे।
अचरज देखे सब फफक पड़े है,
"आंसू " की बूँद जब टपक पड़े है।
बचाओ ! प्रकृति को अनमोल सजीले हैं।

मानव ! स्वयं विनाश को तुले हैं,
जानकर भी अन्जान बन भूले हैं।

  स्वरचित - तेरस कैवर्त्य (आंसू )
             सोनाडुला, (बिलाईगढ़)
             मोबा.- 9165720460


Saturday, 23 July 2016

" प्रेम वेदना "

  Created By- Teras Kaiwartya(Aansu)
  Date - 13/10/2013 ~ PREM VEDNA ~
*************************************
क्यूं पलक में तेरे, चाहे ना ढ़ले अश्रु ,
उर व्यथा से लदे, मेरे नम रहे चक्षु ।
     प्रेयसी से प्रीति है, अतुल अविस्मृति,
     वेदना में सुनयना के, तन क्षीण लगे विकृति ।
लीन है विचरण में, ओ प्रिये सर्व चित्त,
विरक्ति अंश इति पर, जग से परे मृत ।
     कलित चाँदनी छटा की, उद्यत सिर आवृत्ति,
     हँसी रुपसी शिल्पी है, आकृति मन भीत्ति ।
ऐ दिनकर समीर, निहार दें सच युक्ति,
काँटे दें या पुष्प दें, कर तृप्ति या मुक्ति ।
     छोह की फिराक में, तन अर्पण निर्वाण है,
     विक्षिप्त न सूझता कोई, बस तु ही प्रमाण है।
मिटने चला सदी से, दीवानों की रीति है,
अश्क बुंद से लिखा, गिरजा मेरी कृति है।

                स्वरचित :- तेरस कैवर्त्य (आंसू )
                               ग्राम- सोनाडुला,(बिलाईगढ़)
                               जिला- बलौदाबाजार (छ.ग.)
                               मोबा.- 9165720460


कमईया छत्तीसगढ़ीया

हमन निचट गंवईहा, हावन संगी बढ़िया ।
बनी भूति के करईया, हरन छत्तीसगढ़ीया।।

गंवइ गांव के बसोईया, छत्तीसगढ़ी के बोलइया।
दूसर भाखा आये नई, हमर गोठ सुघ्घर भइया।
घाम-घरी म रही-रही, हमर भेस होगय करिया।

हमन निचट गंवईहा, हावन संगी बढ़िया।
बनी भूति के करईया, हरन छत्तीसगढ़ीया।

बड़े बिहनिया उठके, जाथन तरिया नरवा।
लसून मिरचा चटनी संग, खाथन ग पनपुरवा।
का कइबे मिठास येकर, लगथे जब अषड़हा।

हमन निचट गंवईहा, हावन संगी बढ़िया।
बनी भूति के करईया, हरन छत्तीसगढ़ीया।

अब्बड़ सिधवा भइ, पेज पसिया के पियोइया।
नई जानन लन लबारी, छत्तीसगढ़ के रहोइया।
पथरा ढ़ेला के बोहइया, गढ्ढा माटी के खनोइया।

हमन निचट गंवइहा, हावन संगी बढ़िया।
बनी भुति के करइया, हरन छत्तीसगढ़िया।

नइये हयर लेंटर महल, झाला झोपरी के सुतोइया।
चितवा बघवा के डेरा, डोंगरी पहाड़ के रेंगोइया।
नईये अऊ गोड़ म पनही, काँटा खूंटी के गड़ोइया।

हमन निचट गंवईहा, हावन संगी बढ़िया।
बनी भूति के करईया, हरन छत्तीसगढ़िया।

तेंदू चार कोवा मउहा, पुरखा के बिनोइया।
येही डोंगरी झारी हमर, गुजर के चलोइया।
जय जोहार "आंसू " संग, हमर जिनगी के गढ़ोइया।

हमन निचट गंवईहा, हावन सबले बढ़िया।
बनी भूति के कमईया, हरन छत्तीसगढ़िया।

               स्वरचित- तेरस कैवर्त्य (आंसू )
               ग्राम- सोनाडुला, (बिलाईगढ़)
               जिला - बलौदाबाजार (छ.ग.)


Thursday, 21 July 2016

लम्बी सफर है ये जिंदगी, आगे मोड है भारी राह में।
गौर करो जाने मंजिल तक, कुछ खोयेंगे कुछ चाह में।।
                                         तेरस कैवर्त्य (आंसू )